चीन के वैश्विक राजनीति में बढ़ते कदम

चीन ने हाल ही में सऊदी अरब और ईरान के बीच जो समझौता कराया है उसके कई आयाम है। वैश्विक राजनीति में इस समझौते के भी कई मायने निकाले जा रहे हैं। दरअसल, सऊदी अरब और ईरान के बीच वर्षों से शिया और सुन्नी को लेकर टकराव रहा है। दोनों ही देश कई बार आमने-सामने भी आए हैं। ऐसे में दोनों के बीच समझौता काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे भी महत्वपूर्ण है इस समझौते की मध्यस्थता करने वाला देश चीन। चीन ने इन दोनों देशों के बीच यह समझौता करवा कर वैश्विक राजनीति को दो तरफा साधने की कोशिश की है। इसमें पहली है- एक वैश्विक नेता और महाशक्ति के रूप में उभरने वाला देश तो दूसरी है इन दो धुर विरोधी देशों से अपने हितों को साधना। चीन वर्षों से खुद को एशिया में एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बीते एक दशक में चीन ने विश्व में खुद को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की तरफ कदम बढ़ाया है। 

दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और आस्ट्रेलिया समेत अन्य छोटे देशों को धमकाना, अफ्रीका महाद्वीप के जिबूती में अपना नेवी बेस बनाना, सोलोमन में भी इसी मंशा के साथ जाना उसकी इसी मंशा का नतीजा है। चीन धीरे-धीरे ही सही लेकिन उन देशों को अपने साथ लाने में लगा है जो अमेरिका से अलग हैं या फिर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इस तरह उसके इस कदम में सस्ते कर्ज के जाल की भी नीति शामिल है। चीन का बढ़ता कद वैश्विक राजनीति के लिए इसलिए खतरे का संकेत है क्योंकि उसकी नीति हमेशा से ही विस्तारवाद की रही है। वर्तमान में चीन अमेरिका को धरती से लेकर आसमान तक में चुनौती दे रहा है। भविष्य में अंतरिक्ष के क्षेत्र में चीन आगे निकलता दिखाई दे रहा है। 


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