खतरा: आज जोशीमठ तो कल होगा कोई और

 

उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ पर खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल इस आपदा से निपटने का राज्य सरकार के पास कोई फुलप्रुफ प्लान भी दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं, दूसरी तरफ यहां के लोगों के लिए एक एक पल काटना भारी पड़ रहा है। इन लोगों की समस्या केवल इतनी ही नहीं है कि उनका घर गिरने की कगार पर खड़ा है, बल्कि ये भी है कि इन घरों से इनका पीढ़ियों का नाता है और इन्हें बनाए रखने में इनकी वर्षों की जमापूंजी लगी है। अब सरकार इन्हें केवल पांच हजार रुपये प्रतिमाह की मदद देने को दांव चल रही है। जोशीमठ, जिसका संबंध आदी शंकराचार्य से है, जहां उन्होंने ज्ञान हासिल किया था और इसको ज्योतिर्मय का नाम दिया था। समय के साथ इसका अपभ्रंश रूप जोशीमठ के रूप में हमारे सामने है। आदी शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में इस तरह के चार मठ स्थापित किए थे। जोशीमठ को आजतक बचाने में यहां रहने वालों का योगदान सबसे अधिक रहा है। यहां पर रहने वालों का आरोप है कि वो काफी समय से इसको लेकर सरकार और प्रशासन को आगाह कर रहे थे, लेकिन किसी ने भी समय रहते इसकी सुध नहीं ली। इस वजह से अब हालात खराब हो गए हैं। सरकार अब खुद को इस घटना के प्रति संजीदा दिखाने की कोशिश में लगी है, वहीं लोगों का गुस्सा भड़क रहा है। 

कमजोर पहाड़
आपको बता दें कि यह पूरा इलाका एक ऐसी भुरभुरी चट्टान पर मौजूद है, जो भूकंप और अनहोनी की दृष्टि काफी संवेदनशील माना जाता है। अब इसका भविष्य संकट में है। सड़कों, मकानों और पहाड़ों पर आई बड़ी-बड़ी दरारें इस बात का भी सबूत हैं कि इसकी जमीन दरक रही है। ऐसे में इस इला्के और इससे ऊपर के इलाकों में पड़ने वाली बर्फ भविष्य में होने वाली एक बड़ी अनहोनी का साफ संकेत दे रही है। दरअसल जब इसके ऊपरी इलाकों पर पड़ी बर्फ पिघलेगी तो पानी बनकर वो तेजी से नीचे की तरफ आएगी, जिससे यहां की दरारें और बड़ी हो जाएंगी, परिणामस्वरूप इस पहाड़ी इलाके में बड़े पैमाने पर भूस्ख्लन देखने को मिलेगा। इससे पहने आने वाले भूकंप से भी इस तरह के हालात पैदा हो सकते हैं। इसलिए ये खतरा केवल जोशीमठ तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे कहीं अधिक बड़ा है। 

दूसरे जिलों में भी देखने को मिल सकते हैं ऐसे हालात
भविष्य में जोशीमठ जैसे हालात दूसरे जिलों में भी देखने को मिल सकते हैं। पहाड़ों पर विकास के नाम पर हो रही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, पानी निकासी की उचित व्यवस्था का ना होना, मिट्टी के कटाव को ना रोक पाना, बढ़ती आबादी का बोझ जैसे कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से इस पहाड़ी इलाके पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अब जबकि सबकुछ लुटने की कगार पर आ खड़ा हुआ है, तो सरकार खुद को हरकत में आई हुई दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सवाल ये है कि क्या इससे अब कुछ होगा। तो इसका जवाब निराशाजनक है। यहां पर एक बात ध्यान देने योग्य ये भी है कि उत्तराखंड समेत समूचा हिमाल्य सिसमिक जोन 4 में आता है। इस समूचे क्षेत्र का इस जोन में आना ही ये बताने के लिए काफी है कि यहां पर रहने वालों के लिए ये जगह कितनी खतरनाक है। यूं भी वैज्ञानिक मानते हैं कि ये क्षेत्र धीरे-धीरे आगे की तरफ खिसक रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट तो यहां तक कह रही है कि इस पूरे इलाके में अगले करीब तीस वर्षों में जबरदस्त भूकंप आ सकता है, जिसमें बड़ी मात्रा में जान-माल की हानि होगी। 

घनी आबादी वाला नहीं
जोशीमठ का ये इलाका यूं तो घनी आबादी वाला नहीं है, क्योंकि यहां कि जनसंख्या केवल 63627 है। लेकिन बीते एक दशक के दौरान यहां कि जनसंख्या में 17425 लोगों की तेजी आई है। इस लिहाज से भी ये काफी खतरनाक है। जोशीमठ, बद्री विशाल जाने वालों के लिए एक पड़ाव की तरह है। अब इस पर आए संकट को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले समय में बद्रीनाथ धाम जाने वालों को कोई दूसरा वैकल्पिक मार्ग तलाशना है। वो कितने दिन बना रहेगा ये भी कहपाना भी फिलहाल काफी मुश्किल है। सरकार को फिलहाल यहां के लोगों के लिए नई जगह का चुनाव करना है। उसके लिए ये एक बड़ी चुनौती भी है। यहां पर आई विपदा के लिए यहां पर चलने वाले एनटीपीसी प्रोजेक्ट को भी जिम्मेदार बताया जा रहा है। लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि पहाड़ों पर होने वाले इस तरह के विकास के खिलाफ कई बार विभिन्न संगठनों ने आवाज उठाई है, लेकिन हर बार इनकी आवाज को नजरअंदाज कर दिया गया। राज्य की विभिन्न सरकारों ने कई बार पहाड़ी इलाकों को बचाने से संबंधित रिपार्ट को भी खारिज करने का काम किया है। जाने-माने पर्यावरणविद और जल पुरुष के नाम से मशहूर डा. राजेन्द्र सिंह ने भी पहाड़ों से लेकर समतल इलाकों में हो रहे बदलावों पर चिंता जताई है। 


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