कलेजियम पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट में रार

कलेजियम व्यवस्था पर रार यूं तो वर्षों से जारी है लेकिन बीते करीब आठ वर्षों में यह अधिक तेजी से चर्चा का विषय बनी है। दरअसल, सरकार इस व्यवस्था में अधिक बदलाव भी नहीं चाह रही है। वह केवल इस व्यवस्था में अपना एक प्रतिनिधी चाहती है, जो सरकार की मंशा को कलेजियम में जाहिर कर सके और सही व्यक्ति के चयन में केंद्र की भागीदारी साबित कर सके। सरकार की ये मंशा इसलिए भी काफी अहम है क्योंकि कलेजियम में इस छोटे से बदलाव से न केवल दोनों में तनाव दूर होगा बल्कि लोगों को देश की न्याय व्यवस्था में विश्वास भी बढ़ेगा।

 कलेजियम को लेकर कानून मंत्री किरण रिजिजू ने जिस तरह से संविधान का हवाला देते हुए ये बताने की कोशिश की है कि इसमें कहीं भी इस व्यवस्था का जिक्र नहीं है, वो कहीं न कहीं सही है। कलेजियम व्यवस्था में जिस तरह से भाई-भतीजावाद फैला है जिसे न्यायपालिका में 'अंकल कल्चर' भी कहते है, ने देश के आम नागरिकों के मन में ये विचार भरने का काम किया है कि जज अपने ही लोगों को इस कुर्सी पर बिठाते हैं। इस सोच का खत्म होना बेहद जरूरी है। कलेजियम प्रणाली के लिए जिन तीन मामलों को जिम्मेदार ठहराया जाता है उन्हें जजेज केस के नाम से जाना जाता है।

 2014 में इस प्रणाली के खिलाफ जब केंद्र सरकार ने नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (एनजेसी) के गठन का प्रस्ताव रखा था तो उसका मकसद वर्षों से जारी इस विवाद का पटाक्षेप करना ही था। इस कमिशन में छह लोगों को सदस्य बनाने का प्रावधान किया गया था, जिसमें सरकार के साथ न्यायिक व्यवस्था की भी पूरी भागीदारी थी। सरकार ने इसमें यहां तक कहा था कि सरकार की तरफ से जो सदस्य इसमें शामिल होंगे वो हर तीन वर्षों में बदल दिए जाएंगे। अक्तूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के लाए अधिनियम को संविधान के आधारभूत ढांचे से छेड़छाड़ बताते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट ने संविधान में लिखे 'कंसल्टेशन' शब्द की व्याख्या 'सहमति' के रूप में की। जानकार मानते हैं कि कलेजियम व्यवस्था जब से शुरू हुई तब से उसमें किसी तरह का कोई सुधार नहीं किया गया, जो बेहद जरूरी था। कानून बनाने का अधिकार कोर्ट को नहीं है। यह काम विधायिका का है। लेकिन कलेजियम व्यवस्था का गठन कर सुप्रीम कोर्ट ने यही काम किया है। 


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