पिछले दिनों मीडिया में आई एक तस्वीर ने सहसा लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। ये तस्वीर काबुल यूनिवर्सिटी के बाहर हाथ से बनाए बैनर के साथ एक 19 वर्षीय युवती की है जो तालिबान के उस फैसले का अकेले विरोध कर रही है जिसमें युवतियों को यूनिवर्सिटी में हायर एजूकेशन लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस युवती का नाम मारवा है। मारवा को मौजूदा समय में तालिबान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की पोस्टर गर्ल भी कहा जा सकता है। तालिबान को अफगानिस्तान में आए डेढ़ वर्ष हो रहा है, इस बीच तालिबान ने देश की आधी आबादी को उनके हक से महरूम कर दिया है।
प्राथमिक स्कूलों में लड़कियों के लिए प्रवेश पर पाबंदी है, हायर एजूकेशन में उनके लिए कोई जगह नहीं है, एंटरटेनमेंट, पार्क आदि जगहों पर भी इस आधी आबादी पर प्रतिबंध लगा हुआ है। तालिबान, इस तरह के प्रतिबंधों से देश को किस ओर लेकर जा रहा है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। निश्चित रूप से ये अफगानिस्तान की लड़कियों और महिलाओं के लिए बुरा वक्त है। ये दौर कब तक यूं ही बना रहेगा फिलहाल इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल ही है। कुल मिलाकर यदि कहा जाए कि विश्व बिरादरी ने अफगानिस्तान के लोगों को उनके हाल पर अकेला छोड़ने का मन बना लिया है तो ये गलत भी नहीं होगा।
जाहिर शाह के शासन में सबसे अधिक लड़कियों की शिक्षा पर जोर दिया गया था। इसका ही नतीजा था कि इस दौरान करीब डेढ़ लाख युवतियों ने विभिन्न शिक्षण संस्थानों में दाखिला लिया था। कर्नल लतिफा नबीजादा और ब्रिगेडियर जनरल खातूल मोहम्मदाजी का नाम भला कौन नहीं जानता है। लतिफा, देश की पहली महिला फाइटर पायलट भी हैं। वहीं खातूल अफगान नेशनल आर्मी का हिस्सा थीं और देश की पहली महिला पेराट्रुपर हैं।


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