रूस और यूक्रेन युद्ध को एक वर्ष पूरा हो गया है। इस एक वर्ष के दौरान यूक्रेन में 18 हजार लोगों की जान गई है, लाखों लोग बेघर हुए हैं, करोड़ों डालर की संपत्ति का नुकसान हुआ है। वहीं रूस इस युद्ध में रूस के भी करीब 10 हजार जवान मारे गए हैं, हालांकि अनाधिकृत आंकड़ा कहीं अधिक है। इस युद्ध को लेकर शुरूआत में कहा जा रहा था कि यह बस कुछ दिनों या कुछ सप्ताह में खत्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आज एक वर्ष बाद भी यह युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह युद्ध इतना लंबा कैसे खिंच गया और इन सभी के पीछे क्या वास्तव में अकेला रूस ही है या कोई और भी इसके पीछे है। यह सही है कि इस युद्ध को शुरू करने में रूस की बड़ी भूमिका रही थी लेकिन इसको इतना लंबा चलाने में उसकी भूमिका नहीं थी।
यह इतना लंबा इस वजह से खिंचा क्योंकि अमेरिका नहीं चाहता है कि रूस और यूक्रेन के बीच में कोई सुलह हो। दरअसल अमेरिका यूक्रेन के कंधों पर बंदूक रख कर अपने हितों का साध रहा है। इस बहाने उसे रूस को पछाड़ने और उसको नुकसान पहुंचाने के हथियार के रूप में उस पर प्रतिबंध लगाने का एक सुनहरा अवसर भी मिल गया है। इसमें केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि पश्चिमी देश भी पीछे नहीं है। इस एक वर्ष के दौरान अमेरिका ने एक बार भी यूक्रेन से युद्ध रोकने को रूस से सीधी बात करने या खुद मध्यस्थ बनकर इसका हल निकालने की पहल नहीं की। यह जानते हुए कि इसका नतीजा विश्व के हक में नहीं होगा।
इसके बावजूद अमेरिका यूक्रेन को लगातार हथियारों की सप्लाई कर उसको यह झूठा भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि वह रूस को हरा देगा, जो कि नामुकिन है। इस युद्ध की आड़ में कहीं न कहीं अमेरिका हथियारों के जरिए अपना खजाना भी भर रहा है। यदि ऐसा नहीं भी है तो अमेरिका भविष्य में यूक्रेन में कुछ बड़ा करने के सपने जरूर संजोकर बैठा हुआ है। इस युद्ध के एक वर्ष पूरा होने पर जब अमेरिकी राष्ट्रपति अचानक यूक्रेन पहुंचे तो भी उन्होंने इस युद्ध को खत्म करने को लेकर कुछ नहीं कहा बल्कि हथियारों की खेप देने और हर संभव मदद का भरोसा देकर इस युद्ध को और भड़ाकाने की बात जरूर की। वहीं दूसरी तरफ रूस ने परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली स्टार्ट ट्रीटी को निलंबित कर यह संकेत देने की कोशिश की है वो कहीं तक भी जा सकता है। हालांकि इस जंग में रूस परमाणु हमला करने का जोखिम नहीं उठाएगा, लेकिन इसके बाद भी इसका खतरा जरूर बना रहेगा। यूक्रेन के अनुसार इस एक वर्ष के दौरान रूस ने यूक्रेन पर 5 हजार मिसाइल हमले किए और साढ़े तीन हजार बार एयर स्ट्राइक की है।
यहां पर बार-बार युद्ध को रोकने के अमेरिका पर सवाल उठाना इसलिए भी सही हो जाता है क्योंकि शीत युद्ध के बाद भी अमेरिका और रूस के संबंध कभी भी सही मायने में सामान्य नहीं रहे हैं। दोनों ने ही एक दूसरे पर हावी होने में कोई मौका नहीं चूका। इस युद्ध की शुरूआत की यह भी एक बड़ी वजह बनी थी। यहां पर ये भी बताना जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र और तुर्कीये की मध्यस्थता के बाद रूस अनाज डील के लिए सहमत हो गया था। इसलिए यदि सही मायने में संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका इस युद्ध को रुकवाने की कोशिश करते तो वह ऐसा कर सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अब जबकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस युद्ध को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है तो इसके रुकने की संभावना काफी कम है।

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