राहुल गांधी के लंदन में दिए वक्तव्य पर संसद से लेकर टीवी चैनलों पर चर्चा हो रही है। कांग्रेस जहां एक तरफ भाजपा और खुद पीएम नरेन्द्र मोदी के विदेशों में दिए बयानों को याद दिलाने में लगी है तो वहीं सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस नेता राहुल गांधी से सार्वजनिक रूप से सदन में आकर माफी मांगने की मांग कर रही है। हालांकि इस मुद्दे ने देश का सियासी पारा जरूर बढ़ा दिया है। इस बीच एक बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी ने लंदन में जो कहा उसका कोई फायदा उनकी पार्टी को देश में होने वाले आम चुनाव और इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में मिलेगा। इस सवाल का जवाब केवल ना में ही हो सकता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जिस तरह के बयान कांग्रेस की तरफ से दिए जा रहे हैं या पूर्व में दिए गए हैं वह केवल पार्टी को कमजोर करने में ही सहायक हुए हैं और हो सकते हैं। राहुल गांधी के बयान में जिस तरह से देश में लोकतंत्र खत्म होने की बात करते हुए ब्रिटेन और अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग की उससे माना जा रहा है कि वह भारत की राजनीति को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने की बात कर रहे हैं, जो किसी को भी मंजूर नहीं होगी।
कांग्रेस नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयान लगातार ही पार्टी की छवि को खराब कर रहे हैं। हाल ही में उत्तर पूर्व के तीन राज्यों में जिस तरह से कांग्रेस बेदखल हुई और उस पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि ये छोटे राज्य हैं इनमें हार जीत से कोई असर पार्टी पर नहीं पड़ता है। उनका यह बयान दर्शाता है कि कांग्रेस को उत्तर पूर्वी राज्यों की कितनी चिंता है। यह बयान देते हुए खरगे यह भूल गए कि राज्यों में पार्टी की मजबूती से ही राज्यसभा में पार्टी मजबूत होती है। ऐसे में यदि पार्टी छोटे राज्यों में भी हार जाती है तो वह राज्यसभा में भी कमजोर हो जाएगी। इस सूरत में भाजपा कहीं अधिक मजबूत होगी ओर कांग्रेस के पास चाह कर भी कुछ नहीं बचेगा।
कांग्रेस की स्थिति की बात करें तो एक तरफ जहां भाजपा आम चुनाव और इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में मैदान में जा चुकी है वहीं कांग्रेस सुप्त अवस्था से बाहर ही नहीं आना चाह रही है। राहुल गांधी विदेश से वापस आ चुके हैं लेकिन किसी भी पार्टी नेता का ध्यान आने वाले चुनावों पर नहीं है। ऐसे में खरगे के ऊपर पार्टी को जिताने की बड़ी जिम्मेदारी है। कर्नाटक में भी कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। खरगे खुद भी कर्नाटक से ही आते हैं, ऐसे में यदि वह राज्य में पार्टी को बड़ी जीत नहीं दिलवा पाते हैं तो आम चुनाव में उनसे ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी हो जाएगा। वहीं खरगे फिलहाल अपने कर्म युद्ध में अकेले ही दिखाई दे रहे हैं। अकेले रहकर वो क्या कुछ कर पाएंगे, इस सवाल का जवाब अधिकतर लोग जानते हैं।
राहुल गांधी ने अपनी छवि को सुधारने के लिए पिछले माह जो भारत जोड़ो यात्रा संपन्न की थी उसमें उन्होंने छत्तीसगढ़, झारखंड, औडिशा, बिहार, सिक्किम और समूचा उत्तर-पूर्व अछूता ही छोड़ दिया था। ऐसे में इन राज्यों की जनता या फिर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के मन में यह सवाल जरूर है कि ऐसा क्यों किया गया। यही वजह है कि अब भाजपा की निगाह कांग्रेस के इसी पारंपरिक वोट बैंक पर टिकी है। भाजपा के पास इस वोट बैंक को अपनी तरफ मिलाने की वाजिब वजह और सवाल भी है। कांग्रेस का सबसे बड़ी विडंबना यह भी है कि वो अपनी जमीन खोती जा रही है और कोई नेता इस ओर ध्यान नही दे रहा है। पार्टी की अंदरूणी खींचतान भी पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। वहीं आम आदमी पार्टी के बढ़ते कदम भी कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचा रही है।

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